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Bihar Chunav 2025: ‘जयचंद’ की गूंज से फिर टूटेगा लालू का घर?

जयचंद’ की गूंज से टूटेगा लालू का घर

जयचंद’ की गूंज से टूटेगा लालू का घर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले लालू प्रसाद यादव के परिवार में मतभेद और आंतरिक कलह की चर्चा तेज़ हो गई है. तेजस्वी यादव के नेतृत्व को लेकर पार्टी में असहमति, टिकट बंटवारे में असंतोष और पारिवारिक रिश्तों में खटास ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लालू का घर फिर किसी ‘जयचंद’ की वजह से टूटेगा. बिहार की राजनीति में इस बार पारिवारिक एकजुटता और विपक्षी रणनीति दोनों ही सबसे बड़ा चुनावी फैक्टर साबित हो सकते हैं.

रोहिणी ने अपने पोस्ट में सीधे तेजस्वी यादव के सलाहकार संजय यादव का नाम तो नहीं किया, लेकिन उन्होंने 'जयचंद' शब्द का इस्तेमाल किया है. ऐसा माना जा रहा है कि आरजेडी प्रमुख लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य द्वारा उन्हें और तेजस्वी यादव को एक्स पर अनफॉलो करने के बाद मतभेद सामने आए हैं.

लालू यादव के परिवार और पार्टी में मतभेद लोकसभा चुनाव के समय से ही जारी है. तो क्या लालू यादव का परिवार बिहार चुनाव से पहले अपने राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है? यह स्थिति पार्टी के भीतर कुछ नेताओं पर अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को धोखा देने का आरोप लगने की वजह से उत्पन्न हुई है. इसे मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक ‘जयचंद’ की भूमिका कहकर चर्चा में बनाए हुए हैं.

कलह को थमने की कोशिश 

यह विवाद न केवल पार्टी के अंदरूनी संतुलन को प्रभावित कर सकता है बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में लालू परिवार की सियासी ताकत पर भी असर डाल सकता है.परिवार के वरिष्ठ सदस्य और पार्टी के अनुभवी नेता मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल विवाद शांत नहीं हो पाया है.

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को अपनी सियासी विरासत सौंप राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद खुद को सारी चिंताओं से लगभग मुक्त कर चुके थे. उनकी इच्छा है कि तेजस्वी किसी तरह से बिहार के मुख्यमंत्री बन जाएं. लेकिन तेज प्रताप को पार्टी से बाहर करने और फिर अब रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया पर डाले गए पोस्ट से लालू परिवार के अंदर का मतभेद खुलकर सामने आ गया है. लालू परिवार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. अंदर-अंदर कुछ खिचड़ी पक रही है, जिसका असर पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ सकता है.

लालू परिवार में घुसा हरियाणा का जयचंद

रोहिणी आचार्य ने बिहार अधिकार यात्रा में संजय यादव की मौजूदगी की आलोचना की है. संजय यादव हरियाणा का रहने वाला है. वो तेजस्वी यादव का दाहिना हाथ है. इसको लेकर फिर से एक पोस्ट की. उन्होंने कहा, 'यात्रा बस की आगे की सीट पर बैठे राज्यसभा सांसद की तस्वीर के साथ सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया था कि यह सीट लालू प्रसाद या तेजस्वी में से किसी एक के लिए है और उनकी अनुपस्थिति में खाली रहनी चाहिए.' रोहिणी के इस रुख के बाद से लालू परिवार में हंगामा मच गया. “संजय यादव को अप्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाने के लिए उन्हें परिवार की आलोचना का सामना करना पड़ा. उन पर डैमेज कंट्रोल करने का दबाव था.”

आलोक कुमार नाम के एक व्यक्ति ने अपने पोस्ट में लिखा है, "आगे की सीट हमेशा शीर्ष नेतृत्व के लिए निर्धारित होती है. नेता की अनुपस्थिति में भी किसी को इस पर नहीं बैठना चाहिए. जब कोई शीर्ष नेता से बड़ा होने का स्तर रखता है, तो यह अलग बात है. हम, बिहार के लोगों के साथ, लालू प्रसाद या तेजस्वी प्रसाद यादव को आगे की सीट पर बैठे देखने के आदी हैं. हम किसी और को आगे की सीट पर बैठे बर्दाश्त नहीं कर सकते. हालांकि, हम उन चापलूसों (संजय यादव) पर टिप्पणी नहीं कर सकते जो किसी व्यक्ति में एक अद्वितीय रणनीतिकार, सलाहकार और रक्षक देखते हैं.”

बिहार अधिकार यात्रा के दौरान संजय यादव दलित नेताओं शिवचंद्र राम और रेखा पासवान को आगे की सीट पर बिठाकरमतभेदों को कम करने की कोशिश की. इससे रोहिणी को एक सुरक्षा कवच मिल गया और उन्होंने पिछले गुरुवार को एक्स पर पोस्ट किया, "लालू प्रसाद के सामाजिक-आर्थिक न्याय अभियान का मुख्य उद्देश्य वंचितों और सामाजिक सीढ़ी के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों को आगे लाना रहा है. इन तस्वीरों में इन वर्गों के लोगों को आगे की सीट पर बैठे देखना उत्साहजनक है."

 RJD को 'हाईजैक'करने की साजिश?

रोहिणी आचार्य ने 21 सितंबर को एक्स पर एक पोस्ट लिखकर उन लोगों पर निशाना साधा जो "पार्टी को हाईजैक करने के गुप्त इरादा" रखते हैं. उन्होंने आगे कहा, "मेरे बारे में फैलाई जा रही सभी अफवाहें निराधार हैं और मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे एक दुर्भावनापूर्ण अभियान का हिस्सा हैं, जिसे ट्रोल्स, उपद्रवी लोगों, पेड मीडिया और पार्टी को हाईजैक करने के गुप्त इरादे रखने वालों द्वारा हवा दी जा रही है. मेरी न कभी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा रही है, न है और न ही होगी. मैं न तो खुद विधानसभा का उम्मीदवार बनने की ख्वाहिश रखती हूं और न ही किसी और को उम्मीदवार बनाना चाहती हूं. मुझे राज्यसभा सदस्य बनने की कोई इच्छा नहीं है, न ही परिवार के किसी सदस्य से मेरी कोई दुश्मनी है. मुझे पार्टी या भविष्य की किसी सरकार में किसी पद का लालच नहीं है. मेरे लिए, मेरा स्वाभिमान, मेरे माता-पिता के प्रति सम्मान और समर्पण और मेरे परिवार की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है."

रोहिणी ऐसे आई थी सुर्खियों में

रोहिणी ने अपनी बड़ी बहन मीसा भारती की तरह मेडिकल की डिग्री हासिल की है और 2022 में अपने पिता को किडनी दान करके सुर्खियां बटोरीं. यह सर्जरी सिंगापुर के एक अस्पताल में हुई थी. पटना लौटने के बाद, लालू प्रसाद ने अपनी बेटी की खूब तारीफ की. रोहिणी ने पिछले साल सारण से लोकसभा चुनाव लड़ा था और मौजूदा भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी से मामूली अंतर से हार गई थीं.

 तेजप्रताप ने बड़ी बहन का दिया साथ 

रोहिणी आचार्य का चर्चा यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा सकती हैं, लेकिन तेजस्वी यादव ऐसा नहीं चाहते. इस बीच तेजप्रताप यादव ने अपनी बहन के समर्थन में खुलकर बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘‘रोहिणी मुझसे बहुत बड़ी हैं. बचपन में मैंने उनकी गोद में खेला है, जो बलिदान उन्होंने दिया, वह किसी भी बेटी, बहन और मां के लिए कठिन है. उन्होंने जो पीड़ा व्यक्त की है, वह जायज है, जो भी उनका अपमान करेगा, उसे सुदर्शन चक्र का सामना करना होगा.’’


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Written by: Dhirendra Mishra

23 Sep 2025  ·  Published: 06:09 IST

PMLA मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ED को दी आखिरी चेतावनी, कहा - 'ठग की तरह...'

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पीएमएलए से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में अलग-अलग बेंच ने फटकार लगाई. शीर्ष अदालत ने न केवल ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत उसकी कम दोषसिद्धि दर पर सवाल उठाए गए बल्कि उसकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए. अदालत की एक पीठ ने तीखी टिप्पणी की कि केंद्रीय जांच एजेंसी यानी ईडी 'ठग की तरह काम नहीं कर सकती' और उसे कानून के दायरे में काम करना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग सुनवाई में अदालत की दो पीठों ने पीएमएलए की संवैधानिक वैधता और कार्यान्वयन से जुड़े मामलों की सुनवाई की. इस दौरान सुनवाई कर रही पीठ ने  ईडी के तरीकों, उसकी लंबी जांच और 'आनुपातिक दोषसिद्धि दर' पर चिंता जताई.

समाधान योजना रद्द 

 भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड (बीपीएसएल) के दिवालियेपन मामले में 2 मई के अपने फैसले से संबंधित समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. इस फैसले में कंपनी के परिसमापन का आदेश दिया गया था और जेएसडब्ल्यू स्टील द्वारा प्रस्तुत समाधान योजना को रद्द कर दिया गया था. उस फैसले को वापस ले लिया गया है और समीक्षा याचिकाओं पर नए सिरे से सुनवाई हो रही है.

देश की सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यप्रणाली और बीपीएसएल मामले में उसकी जांच पर चर्चा हुई, जिसके बाद पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे और एजेंसी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच तीखी बहस हुई.

चीफ जस्टिस गवई ने पूछा, "सजा की दर क्या है?", इस व्यापक प्रश्न की ओर इशारा करते हुए कि क्या प्रवर्तन निदेशालय के नतीजे पीएमएलए के तहत उसकी व्यापक शक्तियों को उचित ठहराते हैं. मेहता ने स्वीकार किया कि सजा की दर वास्तव में कम थी, लेकिन उन्होंने इसके लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में व्याप्त खामियों, जैसे देरी और प्रक्रियात्मक अक्षमताओं को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, "अन्य दंडनीय अपराधों में भी दोषसिद्धि की दर कम है."

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने ईडी के वकील को फटकार लगाते वक्त कोई रियायत नहीं बरती. न्यायमूर्ति गवई ने कहा, "अगर उन्हें दोषी नहीं भी ठहराया जाता, तो भी आप वर्षों तक बिना किसी सुनवाई के उन्हें सजा सुनाने में सफल रहे हैं. उन्होंने पीएमएलए के तहत लंबी पूर्व-परीक्षण हिरासत और जमानत की कठोर शर्तों की ओर इशारा किया, जिसके कारण अक्सर बिना निर्णय के ही सजा हो जाती है.

ईडी के बचाव में क्या कहा?

ईडी का का बचाव करते हुए एसजी तुषार मेहता ने खुलासा किया कि जांच एजेंसी ने वित्तीय अपराधों के पीड़ितों को लगभग 23 हजार करोड़ की वसूली करके लौटाए हैं. "मैं एक ऐसा तथ्य बताना चाहता हूं जो पहले किसी भी अदालत में कभी नहीं कहा गया. ईडी ने 23 हजार करोड़ की वसूली करके पीड़ितों को दे दिए हैं." सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वसूली गई राशि राज्य के पास नहीं रहती बल्कि धोखाधड़ी के पीड़ितों को वापस कर दी जाती है.

तुषार मेहता ने एजेंसी की गतिविधियों के पैमाने की ओर इशारा करके उसकी आलोचना का भी जवाब देने की कोशिश की. उन्होंने कहा, "कुछ मामलों में जहां राजनेताओं पर छापे पड़े और नकदी मिली, वहां पैसे की अधिकता के कारण हमारी मशीनों ने काम करना बंद कर दिया. हमें नई मशीनें लानी पड़ीं." उन्होंने आगे यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गढ़े गए हानिकारक आख्यानों की ओर भी ध्यान दिलाया, खासकर जब एजेंसी हाई-प्रोफाइल लोगों को निशाना बनाती है.

इसके जवाब में चीफ जस्टिस ने कहा, "हम आख्यानों के आधार पर मामलों का फैसला नहीं करते. मैं समाचार चैनल नहीं देखता. मैं सुबह 10 से 15 मिनट तक अखबारों की सुर्खियां ही पढ़ता हूं." "आप एक बदमाश की तरह काम नहीं कर सकते." 

बदमाश की तरह नहीं कर सकते काम - जस्टिस सूर्यकांत 

दूसरी पीठ ने एक अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ईडी की के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई. इस कोर्ट ने भी कहा कि आप एक बदमाश की तरह काम नहीं कर सकते. आपको कानून के दायरे में काम करना होगा." 


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Written by: Dhirendra Mishra

09 Aug 2025  ·  Published: 06:34 IST

देश की GDP ने मचा दिया धमाका, Q2 में 8.2% बढ़ी भारत की अर्थव्यवस्था, अब आ गई ये चौंकाने वाली खबर

पीएम मोदी

पीएम मोदी

देश के अर्थव्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़ों ने वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 8.2% रही. यह दर न सिर्फ अनुमान से ऊपर रही बल्कि पिछले प्रत्येक प्रमुख आंकड़े को पीछे छोड़ गई. हालांकि, इस उत्साह के बीच कुछ चौंकाने वाले संकेत भी सामने आ रहे हैं, जो बताते हैं कि यह ग्रोथ कितनी स्थायी हो सकती है और किन चुनौतियों से देश अभी जूझ रहा है.

ग्रोथ का विस्फोट: आंकड़े क्या दिखा रहे हैं?

जुलाई–सितंबर 2025 (Q2 FY26) में देश की रियल GDP ग्रोथ दर 8.2% रही, जो पिछले साल इसी तिमाही के 5.6% से काफी अधिक है. यह ग्रोथ Q1 FY26 की 7.8% से भी अधिक है. यानी sequentially भी वृद्धि हुई है. नॉमिनल GDP भी 8.7% बढ़ी, जिससे संकेत मिलता है कि कीमतों एवं सकल माप दोनों में वृद्धि हुई है. 

कौन-कौन से सेक्टर ले रहे आर्थिक रफ्तार

सेकेंडरी सेक्टर (उद्योग, निर्माण आदि) मजबूत प्रदर्शन के साथ आगे रहा — मैन्युफैक्चरिंग में ~9.1% और निर्माण (Construction) में ~7.2% की वृद्धि. तृतीयक (सेवाओं) क्षेत्र ने भी जबरदस्त योगदान दिया. खासकर वित्तीय, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सेवाओं में.

निजी खपत (Private Final Consumption Expenditure - PFCE) में 7.9% की वृद्धि दर्ज हुई — जो पिछले साल की इसी अवधि से बेहतर है. लेकिन इस रफ्तार में छुपी है कुछ “चौंकाने वाली” बातें शामिल हैं. यह वृद्धि कई बाजार अनुमानों (जो 7–7.5% कर रहे थे) को पार कर गई. 

हालांकि, आर्थिक रफ्तार अच्छी है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कम महंगाई (low deflator) और GST-दर कटौती जैसे अस्थायी फैक्टर ने ग्रोथ को असामान्य रूप से ऊपर दिखाया है. यानी मूलभूत ताकत (underlying strength) की जगह, सांख्यिकीय प्रभाव (statistical boost) भी काम कर सकता है. 

इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं, निर्यात दबाव, तथा मुद्रास्फीति-प्रवृत्तियाँ अब भी महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं, जो आगे की तिमाहियों की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं.


 


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Written by: Dhirendra Mishra

29 Nov 2025  ·  Published: 07:04 IST

केंद्र बनाम राज्य: वक्फ एक्ट पर छिड़ी जंग में किसकी है असली ताकत?

वक्फ एक्ट पर तेजस्वी के बयान विवाद का विषय बना.

वक्फ एक्ट पर तेजस्वी के बयान विवाद का विषय बना.

बिहार की राजनीति में वक्फ एक्ट नया विवाद बन गया है. तेजस्वी यादव ने हाल में बयान दिया कि अगर उनकी सरकार बनी तो वक्फ एक्ट को खत्म किया जाएगा. उनके इस बयान के बाद कानूनी और राजनीतिक बहस शुरू हो गई है कि - क्या कोई राज्य केंद्र सरकार के बनाए कानून को निरस्त कर सकता है?

दरअसल, इसको लेकर भारत के संविधान में केंद्र और राज्य के अधिकार स्पष्ट रूप से तय हैं, और यही तय करते हैं कि कौन किस विषय पर कानून बना या बदल सकता है. संविधान और विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, इसका अधिकार केवल संसद के पास है, हालांकि राज्य कुछ संशोधन कर सकते हैं या कानून के पालन पर रोक लगा सकते हैं. इस रिपोर्ट में जानें संविधान क्या कहता है, किन परिस्थितियों में राज्य कानून बदल सकते हैं, और वक्फ एक्ट विवाद के पीछे की पूरी सियासत.

राज्य को वक्फ कानून मानने से इनकार का हक नहीं - एडवोकेट ज्योति 

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ज्योति कुमारी का इस मसले पर कहना है कि कोई भी राज्य वक्फ कानून को मानने से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि यह केंद्र द्वारा संसद में पारित कानून है और भारतीय संविधान के तहत सभी राज्यों में लागू होना अनिवार्य है.

जहां तक वक्फ कानून समवर्ती सूची में आता है. यानी केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं. यदि राज्य का कानून केंद्र के कानून से टकराता है तो संविधान के अनुच्छेद 254 के अनुसार केंद्र का कानून प्रभावी माना जाएगा. अनुच्छेद 256 और 254 के मुताबिक राज्य सरकार केंद्र के बनाए कानून या अधिसूचना का पालन करने से मना नहीं कर सकतीं. 

भारतीय संविधान के अनुसार केंद्र के कानून को लागू करना राज्यों का दायित्व है. राज्य अपनी अनुकूलता अनुसार प्रशासनिक प्रावधानों में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन केंद्रीय कानून को अमान्य घोषित नहीं कर सकते. राज्य सरकार की केंद्रीय कानूनों में बदलाव की है तो वह राष्ट्रपति की मंजूरी से ऐसा कर सकता है. 

आइए, जानते हैं संविधान में इसको लेकर क्या व्यवस्था है.

 1. संविधान में कानून बनाने के अधिकार की व्यवस्था

भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में तीन सूचियां दी गई हैं. केंद्रीय सूची (Union List) जिन विषयों पर सिर्फ केंद्र सरकार कानून बना सकती है. राज्य सूची (State List) जिन पर सिर्फ राज्य विधानसभाएं कानून बना सकती हैं.

समवर्ती सूची (Concurrent List): जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन अगर दोनों में टकराव हो तो केंद्र का कानून लागू होता है.

वक्फ कानून (Waqf Act, 1995) एक केंद्रीय कानून है, जो समवर्ती सूची के धार्मिक और चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े विषयों के तहत आता है.

2. क्या राज्य इसे ‘रद्द’ कर सकता है?

नहीं, किसी राज्य सरकार के पास केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून को पूरी तरह रद्द करने का अधिकार नहीं होता.
हाँ, राज्य चाहे तो :

उस कानून को अपने राज्य में लागू करने में बदलाव (modifications) कर सकता है. या राज्य विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर, केंद्र से कानून में संशोधन की सिफारिश कर सकता है, लेकिन कानून खत्म करना (repeal) केवल संसद (Parliament) का अधिकार है.

 3. क्या राज्य कोई वैकल्पिक कानून बना सकता है?

अगर कोई विषय समवर्ती सूची में आता है, तो राज्य उस विषय पर अपना कानून बना सकता है, लेकिन वह केंद्र के कानून से टकराना नहीं चाहिए. अगर टकराव हो जाता है तो Article 254(1) के तहत केंद्र का कानून ही मान्य रहेगा.

राज्य चाहे तो Article 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी लेकर अपने राज्य में केंद्र के कानून से अलग नियम लागू कर सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया बेहद जटिल है और राजनीतिक स्वीकृति पर निर्भर करती है.

 4. वक्फ एक्ट पर स्थिति

वक्फ एक्ट 1995 संसद द्वारा पारित एक केंद्रीय कानून है. इसके तहत राज्य वक्फ बोर्ड बनाए जाते हैं, लेकिन यह कानून पूरी तरह से केंद्र के अधीन है. इसलिए किसी राज्य सरकार का यह कहना कि 'हम वक्फ एक्ट को रद्द कर देंगे' संवैधानिक रूप से संभव नहीं है. राज्य अधिकतम यह कर सकता है कि वह अपने स्तर पर कानून के कुछ प्रावधानों को लागू न करे या उसमें संशोधन का प्रस्ताव भेजे.

ऐसी स्थित में तेजस्वी यादव का बयान राजनीतिक रूप से भले प्रभावशाली लगे, लेकिन संवैधानिक रूप से यह संभव नहीं है. 

क्या कहा था तेजस्वी यादव ने?

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने हाल में Waqf Amendment Act, 2025 को लेकर ये बयान दिया कि अगर उनकी गठबंधन सरकार बिहार में सत्ता में आती है, तो इस कानून को 'कचरा-पेटी में फेंक' देंगे. उन्होंने इस कानून को बहुसंख्यक समाज के अधिकारों के विरुद्ध और भेदभावपूर्ण बताया है. 

उन्होंने साथ ही Nitish Kumar पर आरोप लगाया कि उन्होंने भाजपा-आरएसएस को बिहार में बढ़ावा दिया है और यह कानून उस पूरे सेटअप का हिस्सा है.


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Written by: Dhirendra Mishra

28 Oct 2025  ·  Published: 06:54 IST